सच्चाई को दर्शाती एक ख़ूबसूरत कहानी : “तीन सवाल”

एक बार एक राजा था। एक दिन वह बड़ा प्रसन्न मुद्रा में था सो अपने वज़ीर के पास गया और कहा कि तुम्हारी जिंदगी की सबसे बड़ी ख़्वाहिश क्या हैं? वज़ीर शरमा गया और नज़रे नीचे करके बैठ गया। राजा ने कहा तुम घबराओ मत तुम अपनी सबसे बड़ी ख़्वाहिश बताओ। वज़ीर ने राजा से कहा हुज़ूर आप इतनी बड़ी सल्लतनत के मालिक हैं और जब भी मैं यह देखता हूँ तो मेरे दिल में ये चाह जाग्रत होती हैं कि काश मेरे पास इस सल्लतनत का यदि दसवां हिस्सा होता तो मैं इस दुनिया का बड़ा खुशनसीब इंसान होता।
ये कह कर वज़ीर खामोश हो गया। राजा ने कहा कि यदि मैं तुम्हें अपनी आधी जायदाद दे दूँ तो। वज़ीर घबरा गया और नज़रे ऊपर करके राजा से कहा कि हुज़ूर ये कैसे मुनकिन हैं? मैं इतना खुशनसीब इंसान कैसे हो सकता हूँ। राजा ने दरबार में आधी सल्लतनत के कागज तैयार करने का फरमान जारी करवाया और साथ के साथ वज़ीर की गर्दन धड़ से अलग करने का ऐलान भी करवाया। ये सुनकर वज़ीर बहुत घबरा गया।


राजा ने वज़ीर की आँखों में आँखे डालकर कहा तुम्हारे पास तीस दिन हैं, इन तीस दिनों में तुम्हें मेरे तीन सवालों के जवाब पेश करना हैं। यदि तुम कामयाब हो जाओगे तो मेरी आधी सल्लतनत तुम्हारी हो जायेगी और यदि तुम मेरे तीन सवालों के जवाब तीस दिन के भीतर न दे पाये तो मेरे सिपाही तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर देंगे। वज़ीर ओर ज्यादा परेशान हो गया। राजा ने कहा मेरे तीन सवाल लिख लो, वज़ीर ने लिखना शुरु किया। राजा ने कहा….
1) इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई क्या हैं?
2) इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा क्या हैं?
3) इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी कमजोरी क्या हैं?
राजा ने तीनों सवाल समाप्त करके कहा तुम्हारा समय अब शुरु होता हैं। वज़ीर अपने तीन सवालों वाला कागज लेकर दरबार से रवाना हुआ और हर संतो-महात्माओं, साधु-फक़ीरों के पास जाकर उन सवालों के जवाब पूछने लगा। मगर किसी के भी जवाबों से वह संतुष्ट न हुआ। धीरे-धीरे दिन गुजरते हुए जा रहे थे। अब उसके दिन-रात उन तीन सवालों को लिए हुए ही गुजर रहे थे। हर एक-एक गाँवों में जाने से उसके पहने लिबास फट चुके थे और जूते के तलवे भी फटने के कारण उसके पैर में छाले पड़ गये थे।
अंत में शर्त का एक दिन शेष रहा, फक़ीर हार चुका था तथा वह जानता था कि कल दरबार में उसका सिर धड़ से कलाम कर दिया जायेगा और ये सोचता-सोचता वह एक छोटे से गांव में जा पहुँचा। वहाँ एक छोटी सी कुटिया में एक फक़ीर अपनी मौज में बैठा हुआ था और उसका एक कुत्ता दूध के प्याले में रखा दूध बड़े ही चाव से जीभ से जोर-जोर से आवाज़ करके पी रहा था।
वज़ीर ने झोपड़ी के अंदर झाँका तो देखा कि फक़ीर अपनी मौज में बैठकर सुखी रोटी पानी में भिगोकर खा रहा था। जब फक़ीर की नजर वज़ीर की फटी हालत पर पड़ी तो वज़ीर से कहा कि जनाबेआली आप सही जगह पहुँच गये हैं और मैं आपके तीनों सवालों के जवाब भी दे सकता हूँ। वज़ीर हैरान होकर पूछने लगा आपने कैसे अंदाजा लगाया कि मैं कौन हूँ और मेरे तीन सवाल हैं? फक़ीर ने सूखी रोटी कटोरे में रखी और अपना बिस्तरा उठा कर खड़ा हुआ और वज़ीर से कहा साहिब अब आप समझ जायेंगे।
फक़ीर ने झुक कर देखा कि उसका लिबास हू ब हू वैसा ही था जैसा राजा उस वज़ीर को भेंट दिया करता था। फक़ीर ने वज़ीर से कहा मैं भी उस दरबार का वज़ीर हुआ करता था और राजा से शर्त लगा कर गलती कर बैठा। अब इसका नतीजा तुम्हारे सामने हैं। फक़ीर फिर से बैठा और सूखी रोटी पानी में डूबो कर खाने लगा। वज़ीर निराश मन से फक़ीर से पूछने लगा क्या आप भी राजा के सवालों के जवाब नहीं दे पाये थे। फक़ीर ने कहा कि नहीं मेरा केस तुम से अलग था।
मैने राजा के सवालों के जवाब भी दिये और आधी सल्लतनत के कागज को वहीं फाड़कर इस कुटिया में मेरे कुत्ते के साथ रहने लगा। वज़ीर ओर ज्यादा हैरान हो गया और पूछा क्या तुम मेरे सवाल के जवाब दे सकते हो? फक़ीर ने हाँ में सिर हिलाया और कहा मैं आपके दो सवाल के जवाब मुफ्त में दूँगा मगर तीसरे सवाल के जवाब में आपको उसकी कीमत अदा करनी पड़ेगी।
अब फक़ीर ने सोचा यदि बादशाह के सवालों के जवाब न दिये तो राजा मेरे सिर को धड़ से अलग करा देगा इसलिए उसने बिना कुछ सोचे समझे फक़ीर की शर्त मान ली। फक़ीर ने कहा तुम्हारे पहले सवाल का जवाब हैं “मौत”।
इंसान के जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई मौत हैं। मौत अटल हैं और ये अमीर-गरीब, राजा-फक़ीर किसी को नहीं देखती हैं। मौत निश्चित हैं। अब तुम्हारे दूसरे सवाल का जवाब हैं “जिंदगी”। इंसान की जिंदगी का सबसे बड़ा धोखा हैं जिंदगी। इंसान जिंदगी में झूठ-फरेब और बुरे कर्मं करके इसके धोखे में आ जाता हैं,अब आगे फक़ीर चुप हो गया। वज़ीर ने फक़ीर के वायदे के मुताबिक शर्त पूछी, तो फक़ीर ने वज़ीर से कहा कि तुम्हें मेरे कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पीना होगा।
वज़ीर असमंजस में पड़ गया और कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पीने से इंकार कर दिया। मगर फिर राजा द्वारा रखी शर्त के अनुसार सिर धड़ से अलग करने का सोचकर बिना कुछ सोचे समझे कुत्ते के प्याले का झूठा दूध बिना रुके एक ही सांस में पी गया।फक़ीर ने जवाब दिया कि यही तुम्हारे तीसरे सवाल का जवाब हैं। “गरज”* इंसान की जिंदगी की सबसे बड़ी कमजोरी हैं “गरज”। गरज इंसान को न चाहते हुए भी वह काम कराती हैं जो इंसान कभी नहीं करना चाहता हैं। जैसे तुम!
तुम भी अपनी मौत से बचने के लिए और तीसरे सवाल का जवाब जानने के लिए एक कुत्ते के प्याले का झूठा दूध पी गये। गरज इंसान से सब कुछ करा देती हैं। मगर अब वज़ीर बहुत प्रसन्न था क्योंकि उसके तीनों सवालों के जवाब उसे मिल गये थे। वज़ीर ने फक़ीर को शुक्रिया अदा किया और महल की ओर रवाना हो गया। जैसे ही वज़ीर महल के दरवाजे पर पहुँचा उसे एक हिचकी आई और उसने वहीं अपना शरीर त्याग दिया। उसको मौत ने अपने आगोश में ले लियाअब हम भी विचार करें कि क्या कहीं हम भी तो जिंदगी की सच्चाई को भूले तो नहीं बैठे हैं? जी हाँ जिंदगी की सच्चाई ये मौत। ये मौत न छोटा देखती हैं न बड़ा, न सेठ साहूकार देखती हैं। ये तो न जाने कब किस को अपने आगोश में ले ले कुछ कहा नहीं जा सकता।
क्योंकि ये अटल सत्य हैं और ये हर एक को आनी हैं। क्या हम जिंदगी के धोखे में तो नहीं आ पड़े हैं? हाँ जी बिल्कुल! हम धोखे में ही आये हुए हैं। हम जिंदगी को ऐसे जीते हैं जैसे ये जिंदगी कभी खत्म न होगी। हम जिंदगी में हर रोज नये-नये कर्मों का निर्माण करते हैं। इन कर्मों में कुछ अच्छे होते हैं तो कुछ बुरे। हम जिंदगी के धोखे में ऐसे फंसे हुए हैं कभी भूल से भी मालिक का शुकर नहीं करते हैं, कभी सच्चे दिल से मालिक का भजन सिमरन नहीं करते हैं। बस जिंदगी को काटे जा रहे हैं। क्या हम भी तो जिंदगी की कमजोरी के शिकार तो नहीं बने बैठे हैं? जी हाँ, हम सभी गरज के तले दबे हुए हैं। कोई अपने परिवार को पालने की गरज में झूठ-फरेब की राह पर चलने लगता हैं तो कोई चोरी और लूटपाट। हम सभी गरज की दलदल में फंसे हुए हैं।
हमें भी चाहिए कि जिंदगी की सच्चाई मौत को ध्यान में रखते हुए, जिंदगी की झूठ में न फंसे। क्योंकि जितना हम जिंदगी की सच्चाई से मुख मोड़ेगें उतना ही हम धोखे का शिकार होते जायेंगे। अत: जिससे हम जीवन भर जिंदगी की कमजोरी गरज के दलदल में ही फंसे रहे और बाहर ही न निकल सकें। इसलिए समय रहते हुए मालिक का भजन सिमरन करते रहे और मालिक को याद करते हुए उनका शुक्रियाअदा करते रहें। क्योंकि न जाने कब मालिक का फरमान आ जाए।

प्यार के बीच की रूकावट दूर करती एक कहानी : प्यार की जीत

बच्चों में भेद करना प्यार के साथ धोखेबाजी सरीखा है. प्रेमप्रकाश जिस दकियानूसी दुनिया के अंधेरों में खोए थे, वहां राधिका एक नई सुबह ले कर आई थी. लेकिन राह में रुढ़ियों के कांटे भला कौन दूर करता.

‘‘मैं बिलाल से बेइंतहा मोहब्बत करती हूं. चाहे कुछ भी हो जाए मैं उसी से शादी करूंगी. आप मुझे कुछ भी कर के रोक नहीं सकते. मेरे जन्म से आज तक इन 21 सालों में आप ने सिर उठा कर भी मेरी ओर नहीं देखा क्योंकि मैं एक बेटी हूं. ऐसे में आप अब क्यों मेरी जिंदगी में दखल दे रहे हैं? यह मेरी जिंदगी है. अगर इस मामले में भी मैं आप की बात सुनूंगी तो मेरी पूरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं इसे बरदाश्त नहीं कर सकती हूं. गलत क्या है और सही क्या है, यह मैं जानती हूं. इस के अलावा मैं अब नाबालिग नहीं हूं. अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार है मुझे.’’ अपने समक्ष खड़ी अपनी बेटी राधिका की बातें सुन कर प्रेमप्रकाश आश्चर्यचकित रह गए. प्रेमप्रकाश को यकीन ही नहीं हो रहा था कि जो उन के सामने बोल रही है वह उन की बेटी राधिका है. राधिका ने इस घर में आए इन 2 सालों में अपने पिता के सामने कभी इतनी हिम्मत से बात नहीं की.

राधिका को अपने पिता से इस तरह बात करते हुए देख कर उस की मां लक्ष्मी भी हैरान थी. उसे भी राधिका के इस नए रूप को देख कर यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह उस की बेटी राधिका ही है. अगर एक सलवारकमीज खरीदनी होती तो भी वह अपने पापा से पूछने के लिए घबराती. अपनी मां के पास आ कर ‘मां, आप ही पापा से पूछिए और खरीद दीजिए न प्लीज, प्लीज मां’ बोलने वाली राधिका आज अपने पापा के सामने अचानक शेरनी कैसे बन गई? अपने पापा के सामने इस तरह खड़े हो कर बेधड़क बातें कर रही राधिका को देख कर लक्ष्मी सन्न रह गई. उस से भी बड़ी हैरानी की बात यह है कि राधिका का यह कहना कि वह एक मुसलमान युवक से प्यार करती है और उसी से शादी भी करना चाहती है. इस प्रस्ताव को प्रेमप्रकाश के सामने रखने के लिए भी हिम्मत चाहिए, क्योंकि प्रेमप्रकाश एक कट्टर हिंदू हैं. उन के सामने उन की बेटी कह रही है कि वह एक मुसलमान युवक से शादी करना चाहती है. लक्ष्मी ने मन में सोचा कि जो भी हो, राधिका की हिम्मत की दाद देनी चाहिए.

एक कड़वा सच यह है कि लक्ष्मी कभी अपने पति के सामने ऐसी बातें नहीं कर सकती थी. शादी हुए इन 30 सालों में लक्ष्मी ने पति के सामने कभी अपनी राय जाहिर नहीं की. उन के परिवार की प्रथा है कि औरतों को आजादी न दी जाए. उन का मानना है कि स्त्री का दर्जा हमेशा पुरुष से कम होता है. मगर लक्ष्मी के मायके की बात अलग थी. लक्ष्मी के पिता ने उसे एक महारानी की तरह पालपोस कर बड़ा किया. उस के पिता की 3 बेटियां थीं और वे इस से बहुत खुश थे. वे अपनी लड़कियों को घर की महालक्ष्मी मानते थे और उन्हें भरपूर स्नेह व इज्जत देते. उन्हें अपनी तीनों बेटियों पर गरूर था खासकर अपनी बड़ी बेटी लक्ष्मी पर. लक्ष्मी की बातों को वे सिरआंखों पर रखते थे. लक्ष्मी की ख्वाहिश का मान करते हुए उन्होंने उसे अंगरेजी साहित्य में बीए करने की इजाजत दी.

लक्ष्मी के पिता ने अपनी बेटी की शादी के मामले में एक गलत फैसला ले लिया. प्रेमप्रकाश के परिवार के बारे में अच्छी तरह पूछताछ किए बगैर उस परिवार की शानोशौकत को देख कर अपनी बेटी की शादी प्रेमप्रकाश से करवाई. शादी के दूसरे दिन ही लक्ष्मी को ससुराल में एक झटका सा लगा. लक्ष्मी को अंगरेजी अखबार पढ़ते देख कर उस के ससुर ने उसे फटकारा, ‘इस तरह सुबह अंगरेजी अखबार पढ़ना एक बहू को शोभा देता है क्या? तुम्हारी मां ने तुम्हें यही सिखाया है क्या? मर्दों की तरह औरतों का अखबार पढ़ना अच्छे संस्कार नहीं हैं. दुनिया के बारे में जान कर तुम क्या करोगी? तुम्हारा काम है रसोई में खाना पकाना और बच्चे पैदा कर के उन का पालनपोषण करना, समझी तुम?’ ससुरजी की बातें सुन कर लक्ष्मी को ताज्जुब हुआ. ससुराल में आए कुछ ही दिनों में लक्ष्मी को पता चल गया कि औरतों को मर्दों का गुलाम बना कर रहना ही इस घर की परंपरा है. न चाहते हुए भी लक्ष्मी ने अपनेआप को बदलने की कोशिश की.

समय आया जब लक्ष्मी अपने पहले बच्चे की मां बनने वाली थी. जब डाक्टर ने यह खबर सुनाई तो लक्ष्मी बेहद खुश हुई. उस ने खुशी से अपने पति प्रेमप्रकाश को यह समाचार सुनाया तो उन्होंने कहा, ‘‘सुनो, अगर लड़का पैदा हुआ तो उसे ले कर इस घर में आना. लड़की पैदा हुई तो उसे अपने मायके में छोड़ कर आना, समझी. खानदान को आगे बढ़ाने के लिए मुझे लड़का ही चाहिए.’’ यह सुनते ही लक्ष्मी सन्न रह गई. वह सोच भी नहीं सकती थी कि कोई आदमी अपनी पहली संतान के बारे में ऐसा भी सोच सकता है.

बहरहाल, लक्ष्मी ने एक लड़के को जन्म दिया और उस के बाद लक्ष्मी की इज्जत उस घर में बढ़ गई. इस का कारण यह था कि लक्ष्मी की दोनों जेठानियां अपनी पहली संतान लड़की होने केकारण उन्हें अपने मायकों में ही छोड़ कर आईर् थीं. लक्ष्मी के ससुर ने उसे एक कीमती गहना तोहफे में दिया. उस के 2 वर्षों बाद जब लक्ष्मी का दूसरा लड़का पैदा हुआ तब से प्रेमप्रकाश अपना सीना चौड़ा करते हुए घूमते थे.

लक्ष्मी के कई बार मना करने के बावजूद उस के दोनों बेटों संदीप और सुदीप को उस के पति और ससुर ने लाड़प्यार दे कर बिगाड़ दिया. अगर लक्ष्मी बीच में बोले तो, ‘ये दोनों लड़के हैं, शेर हैं मेरे बच्चे. उन्हें पढ़ने की कोई जरूरत नहीं. कुछ भी कर के जिंदगी में सफल हो जाएंगे,’ कह कर लक्ष्मी के दोनों बेटों को पूरी तरह बिगाड़ दिया प्रेमप्रकाश ने. लक्ष्मी बेबस हो कर देखती रह गई. इतने में लक्ष्मी तीसरी बार गर्भवती हुई. प्रेमप्रकाश तो बड़े गरूर से कहता रहा, ‘यह भी बेटा ही होगा.’ प्रेमप्रकाश की इस बेवकूफी को देख कर लक्ष्मी को समझ में ही नहीं आया कि वह रोए या हंसे.

मगर इस बार लक्ष्मी के एक खूबसूरत बेटी पैदा हुई. लक्ष्मी ने अपनी नन्ही सी परी को अपने सीने से लगा लिया. जब प्रेमप्रकाश को यह खबर मिली कि लक्ष्मी ने एक लड़की को जन्म दिया है तो वे गुस्से से पागल हो गए. बच्ची को देखने के लिए भी नहीं आए और ऊपर से उन्होंने चिट्ठी लिखी कि घर वापस आते समय बेटी को मायके में छोड़ कर आना. अगर वहां भी बच्ची को पालना नहीं चाहें तो उसे किसी अनाथ आश्रम में दाखिल करवा देना. लक्ष्मी अपनी बच्ची को अपनी छोटी बहन के हवाले कर अपने पति के घर वापस आ गई. लक्ष्मी की बहन के 2 बेटे थे, इसलिए उस ने खुशीखुशी लक्ष्मी की बेटी की परवरिश करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. लक्ष्मी की छोटी बहन ने उस प्यारी सी बच्ची का नाम राधिका रखा.

लक्ष्मी के बेटे संदीप और सुदीप दोनों अव्वल नंबर के निकम्मे, बदतमीज और बदचलन बने. 10वीं कक्षा में दोनों फेल हो गए और लफंगों की तरह इधरउधर घूमने लगे. लाख कोशिशों के बावजूद लक्ष्मी अपने बेटों को अच्छे संस्कार नहीं दे पाई. संदीप और सुदीप दोनों गैरकानूनी काम कर के 2 बार जेल भी जा चुके थे. लक्ष्मी ने अपनी बहन की चिट्ठी से यह जान लिया कि राधिका पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहती है और अच्छे संस्कारों से आगे बढ़ रही है. लक्ष्मी को इतनी कठिनाइयों के बीच इसी समाचार ने खुश रखा. मगर वह खुशी बहुत दिनों तक नहीं टिकी. लक्ष्मी की छोटी बहन, जिसे कोई बीमारी नहीं थी, अचानक दिल का दौरा पड़ा और 4 दिन अस्पताल में रहने के बाद चल बसी. उस के पति ने सोचा कि एक 21 साल की लड़की को बिन मां के पालना खुद से नहीं होगा, इसलिए राधिका को लक्ष्मी के पास छोड़ने का फैसला लिया. उस वक्त राधिका फैशन टैक्नोलौजी का कोर्स कर रही थी और वह अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी.

पहले तो प्रेमप्रकाश ने राधिका को फैशन टैक्नोलौजी की पढ़ाई करने की इजाजत देने से सख्त मना कर दिया. लेकिन लक्ष्मी ने उन से गुजारिश की, ‘कोर्स को खत्म होने में अब सिर्फ एक ही साल बाकी है, उसे बीच में रोकना नहीं. उसे पूरा करने दीजिए, मैं आप के पैर पड़ती हूं.’ बहुत सोचने के बाद आखिरकार प्रेमप्रकाश ने राधिका को कालेज भेजने के लिए मंजूरी दी. राधिका को यह सब बड़ा अजीब सा लगा. एक तो पहली बार वह अभी अपनी 21 साल की उम्र में अपने जन्मदाता मांबाप से मिल रही थी, दूसरी बात जिस माहौल में वह बड़ी हुई थी वहां इस तरह औरतें अपने पति के सामने झोली फैला कर नहीं खड़ी होती थीं. दोनों को वहां पर बराबर का सम्मान दिया जाता था.

लक्ष्मी ने भी अपनी बेटी के प्रति अपना प्यार नहीं जताया. उस के मन में एक ही विचार था कि पढ़ाई खत्म होते ही राधिका का ब्याह एक ऐसे घर में हो जहां औरतों को इज्जत दी जाए. बेटी की शादी में पिता की उपस्थिति जरूरी है, इसलिए लक्ष्मी अपने पति से अपनी बेटी के बारे में कोई भी बहस नहीं करना चाहती थी और प्रेमप्रकाश की हर बात मानती थी.

प्रेमप्रकाश की देखादेखी उन के दोनों बेटे भी औरतों की इज्जत नहीं करते थे. दोनों मिल कर अकसर राधिका को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते. बचपन से लाड़प्यार और इज्जत से पली राधिका को इस माहौल में घुटन होने लगी. उसे इस बात का बहुत अफसोस था कि उस की मां ने भी अपना प्यार जाहिर नहीं किया. इसी बीच राधिका के कालेज में वार्षिक महोत्सव हुआ और तभी पहली बार उस की मुलाकात बिलाल से हुई. उस उत्सव में भाग लेने के लिए कई कालेजों से बहुत सारे छात्र आए हुए थे. राधिका एक अच्छी गायिका थी और उस की आवाज में मिठास थी. जिस के कारण उस के कालेज के छात्रों और अध्यापकों ने राधिका को गाने के लिए प्रोत्साहित किया ताकि उन के कालेज को पुरस्कार मिले. राधिका ने उस प्रतियोगिता के लिए खूब तैयारी भी की. उस के साथ उस की सहेली गिटार बजाने वाली थी.

मगर उत्सव के दिन जो लड़की गिटार बजाने वाली थी उस के पिता बीमार हो कर अस्पताल में भरती थे और वह उत्सव में न आ सकी. राधिका अब उलझन में पड़ गई. गिटार के बिना राधिका का गाना अधूरा होगा और इसी कारण उसे पुरस्कार मिलने की उम्मीद नहीं थी. राधिका असमंजस में पड़ गई और रोने लगी. उस की सहेलियां ढाढ़स बंधाने लगीं और उसे चुप कराने की कोशिश कर रही थीं. उसी वक्त एक नौजवान वहां आया और उस ने कहा, ‘एक्सक्यूज मी, मैं आप की बातें सुन रहा था और मैं समझ गया हूं कि आप को एक गिटार बजाने वाला चाहिए. अगर आप को कोई एतराज न हो तो क्या मैं आप की मदद कर सकता हूं?’ इसे सुन कर राधिका और उस की सहेलियां ताज्जुब से एकदूसरे को देखने लगीं. एक पल के लिए वे सोच में पड़ गईं कि क्या जवाब दें.

राधिका और उस की सहेलियों को उस अनजान युवक का प्रस्ताव स्वीकार करने में झिझक हुई. वह किसी और कालेज का छात्र है, फिर वह क्यों अपने कालेज को छोड़ कर हमारे कालेज के लिए गिटार बजाने को तैयार है, ऐसा क्यों? उन के मन में यह डर था कि यह ईव टीजिंग का कोई चक्कर तो नहीं. उस युवक ने हंसते हुए कहा, ‘मैं एक अच्छा गिटारिस्ट हूं. इसलिए मैं ने सोचा कि मैं आप की मदद करूं, अगर आप बुरा न मानें तो. ज्यादा मत सोचिए, हमारे पास वक्त बहुत कम है.

उस की गंभीरता देख कर राधिका और उस की सहेलियां उस लड़के की मदद लेने के लिए तैयार हो गईं. उस लड़के ने तुरंत अपने दोस्त से गिटार ले कर राधिका के साथ मिल कर 2 बार रिहर्सल किया. राधिका ने देखा कि वह उस के साथ बड़ी तमीज के साथ बातें कर रहा था और बहुत ही मृदुभाषी था. राधिका स्पर्धा को ले कर बहुत परेशान थी और इस हड़बड़ी में उस ने उस लड़के का नाम तक नहीं पूछा. जब उन की बारी आई तो दोनों मंच पर आए. राधिका अपनेआप को भूल कर अपने गाने में मंत्रमुग्ध हो गई और उसे पुरस्कार भी मिला. पुरस्कार लेते समय राधिका उस लड़के को भी अपने साथ मंच पर ले गई.

विदाई के समय उस लड़के ने राधिका को अपना नाम बताया, ‘मेरा नाम बिलाल है. मैं अंगरेजी साहित्य में एमए कर रहा हूं. आप मेरा मोबाइल नंबर सेव कर लीजिए. अगर आप को कोई परेशानी न हो तो हम फोन पर बात कर सकते हैं और दोस्ती को आगे कायम रख सकते हैं.’ राधिका ने एक मीठी सी मुसकान के साथ बात कर रहे बिलाल की ओर देखा.

राधिका ने पहली बार बिलाल को गौर से देखा. 6 फुट का कद, चौड़े कंधे, गेहुंआ रंग, बड़ीबड़ी आंखें और चौड़ा माथा तथा उस के चेहरे पर छलक रही एक मधुर मुसकान. राधिका को लगा कि सच में बिलाल एक आकर्षक युवक है. इस के अलावा लड़कियों के प्रति उस का बरताव राधिका को बेहद पसंद आया. उस घटना के बाद दोनों अकसर फोन पर बातें करते थे. बिलाल की आवाज में भी एक अनोखा जादू था. बड़े अदब से बात करने वाला उस का अंदाज राधिका को उस की ओर खींचने लगा. कई बार फोन पर बात होने के बाद दोनों ने एक कौफी शौप में मिलने का फैसला लिया. बिलाल एक बड़ी गाड़ी में आया. फोन पर इतनी बातें करते वक्त कभी अपनी हैसियत के बारे में उस ने कुछ भी नहीं बताया. अब भी बड़ी नम्रता से कहा, ‘वापस जाते

समय आप को मोटरबाइक में छोड़ना अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए गाड़ी ले कर आया.’ उस की आवाज में जरा भी घमंड नहीं था. बिलाल ने अपने परिवार के बारे में सबकुछ बताया. उस ने बताया कि लखनऊ की मशहूर कपड़े की दुकान जमाल ऐंड संस के मालिक हैं उस के पिता और उस की मां घर पर ही बुटीक चलाती हैं जहां वे डिजाइनर साडि़यां तैयार कर उन्हें बेचती हैं. उस के बडे़ भाई पिता के साथ कारोबार संभालते हैं और एक छोटी बहन कालेज में पढ़ती है. यह सुनती रही राधिका बिलाल को अपने परिवार के बारे में क्या बताए, सोचने लगी. अपने पिता या अपने भाइयों की झूठी तारीफ करने के बजाय वह चुप रही.

दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई. एक दिन बिलाल ने कौफी शौप में कौफी पीते समय कहा, ‘राधिका, मुझे बातें घुमाना नहीं आता. मैं आप से बेहद प्यार करता हूं और आप से शादी करना चाहता हूं. क्या आप को मेरा प्यार कुबूल है.’ यह बात सुन कर राधिका को एक झटका सा लगा, क्योंकि वह बिलाल को दोस्त ही मानती रही और कभी भी उस ने उसे इस नजरिए से नहीं देखा था. इस के अलावा राधिका ने सोचा कि दोनों के बीच मजहब की दीवार है और यह शादी कैसे हो सकती है?

‘मैं जानता हूं कि हमारा मजहब अलग है मगर वह हमारे बीच नहीं आ सकता. आप को जल्दबाजी में फैसला लेने की जरूरत नहीं है. आप मेरे बारे में और हमारे रिश्ते के बारे में आराम से ठंडे दिमाग से सोचिए. आप मुझ से शादी न करना चाहें तो भी मैं दोस्ती को बरकरार रखना चाहता हूं.’ राधिका इस प्रस्ताव के लिए बिलकुल तैयार नहीं थी. वह गहरी सोच में पड़ गई. दिल की बात किसी के साथ बांटने के लिए राधिका की कोई करीबी सहेली भी नहीं थी.

राधिका रातदिन इस बारे में सोचने लगी. राधिका ने सोचा कि अगर उस के पिता ने उस की शादी करवाई तो वे जरूर एक ऐसे लड़के व परिवार को ढूंढ़ निकालेंगे जो औरत को इंसान नहीं मानते. उस से भी नहीं पूछेंगे कि वह लड़का उसे पसंद है या नहीं. बहुत सोचने के बाद राधिका को यह एहसास हुआ कि मन ही मन में वह बिलाल से प्यार करने लगी है. बस, अपने दिल की बात समझ नहीं पाई और बिलाल ने अपने दिल की बात कह कर उस के अंदर सोए हुए प्यार को जगा दिया. बिलाल एक नेक और अच्छा इंसान है. अच्छे खानदान का है. राधिका को ऐसा लगा कि बिलाल से अच्छा पति ढूंढ़ने पर भी कहीं नहीं मिलेगा. काफी कशमकश के बाद राधिका ने फैसला लिया कि जिस परिवार ने उसे प्यार और इज्जत नहीं दी उस परिवार के लिए वह अपने प्यार की बलि क्यों चढ़ाए.

राधिका ने 15 दिनों के बाद बिलाल से अपने प्यार का इजहार किया. उसी दिन बिलाल उसे अपने घर ले गया.?

बिलाल की गाड़ी एक आलीशान बंगले के सामने आ कर रुक गई. गाड़ी से उतर कर झिझकती हुई राधिका अंदर गई. ‘आजा मेरी बहूरानी’ एक प्यारभरी पुकार सुन कर राधिका ने उस तरफ देखा तो वहां एक और मुसकराती हुई औरत खड़ी थी. ‘मेरी अम्मीजान जुबैदा बेगम,’ बिलाल ने कहा और वहां 2 और औरतें खड़ी थीं और उन में से एक औरत को ‘मेरी भाभीजान जीनत और सूट पहने एक लड़की को ‘मेरी छोटी व इकलौती बहन शबनम, कालेज में पढ़ रही है,’ कह कर बिलाल ने सब से परिचय करवाया. राधिका ने अपने संस्कार के अनुसार बिलाल की मां के पैर छुए, मगर बिलाल की मां ने राधिका को उठा कर अपने सीने से लगाया और कहा, ‘नहीं, मेरी बेटी, तुम्हारी जगह यहां नहीं बल्कि यहां मेरे दिल में है. आ कर यहां आराम से बैठो. डर क्यों रही हो, मैं भी एक मां हूं.’ यह सुनते ही राधिका का मनोबल बढ़ गया. ऐसे में शबनम बोली, ‘अरे, मेरी नई भाभी, आप क्यों इतनी टैंशन में हैं. अपनी टैंशन कम करने के लिए यह ठंडा पानी पीजिए.’ राधिका ने भी हंसते हुए उस से पानी का गिलास ले लिया.

इसी दौरान उस घर की बहू जीनत एक प्लेट में कुछ मिठाई और नमकीन ले कर आई, ‘लीजिए, मेरी नई देवरानीजी, इसे खाइए.’ इतने में बिलाल के बड़े भाई और पापा आ गए. बिलाल ने अपने पिताजी से राधिका का परिचय करवाया. उस की आवाज में डर बिलकुल नहीं था. उस ने प्यार और इज्जत के साथ अपने पिताजी से बात की. ‘अब्बूजान, मैं ने आप से कहा था न कि मैं एक लड़की से प्यार करता हूं, यही वह लड़की है राधिका.’ बिलाल की बातें सुनते ही पिताजी ने मुसकराते हुए राधिका के पास आ कर कहा, ‘हमेशा खुश रहो बेटी.’

बिलाल को अपने पिता से बातें करते हुए देख कर राधिका को ऐसा लगा कि बापबेटे नहीं, बल्कि 2 भाई आपस में बातें कर रहे हैं. फिर बिलाल ने अपने भाई को राधिका से मिलवाया. अपने भाई से एक दोस्त की तरह पेश आया बिलाल. बिलाल के परिवार से मिलने के बाद राधिका ने फैसला कर लिया कि चाहे जो भी हो बिलाल से शादी करने के अपने फैसले से वह पीछे नहीं हटेगी. अपने पिता से भी उस ने हिम्मत जुटा कर कहा, ‘मैं 21 साल की हूं. अपनी जिंदगी का अहम फैसला लेने की उम्र है मेरी. अगर आप अपने बेटों के साथ मेरे रास्ते में अड़चन डालेंगे तो मजबूरन मुझे कानून की मदद लेनी पड़ेगी. मैं आगे आने वाली किसी भी मुसीबत का सामना करने के लिए तैयार हूं और मैं अपने फैसले पर अटल हूं.’

राधिका की दृढ़ता देख कर प्रेमप्रकाश ने भी अपना निर्णय सुनाया, ‘‘मुझे तुम्हारी कोई परवा नहीं. तुम जियो या मरो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. मगर एक बात कान खोल कर सुन लो, अगर तुम्हारी शादीशुदा जिंदगी में कोई समस्या आए तो मायका समझ कर इस घर में कदम रखने के बारे में सोचना मत. याद रहे, मेरे लिए तुम मर चुकी हो.’’ प्रेमप्रकाश ने एक बाप की तरह नहीं, बल्कि किसी दुश्मन की तरह राधिका के साथ व्यवहार किया. बिलाल और राधिका की शादी हुए लगभग 2 महीने बीत गए. शादी के दिन राधिका ने बिलाल से कहा, ‘‘बिलाल, यह मेरी जिंदगी का बहुत बड़ा फैसला है. अगर कुछ गलती हो जाए तो सिर छिपाने के लिए मेरे पास मेरा मायका भी नहीं है.’’ बिलाल ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘हमारे घर में तुम्हें इतना प्यार मिलेगा कि तुम्हें अपने मायके की याद कभी नहीं आएगी. यह मेरा वादा है तुम से.’’

राधिका ने सोचा था कि बिलाल के घर वाले उन दोनों की शादी इसलामिक तौरतरीकों से करेंगे. मगर शादी के 2 दिन पहले ही बिलाल के मां और पापा ने राधिका से इस के बारे में बात की. उन्होंने कहा, ‘‘तुम ने मेरे बेटे से प्यार किया है और शादी भी करने वाली हो, इस वजह से तुम्हारे ऊपर हम अपना मजहब नहीं थोपना चाहते. दबाव में पड़ कर एक मजहब को कोई अपना नहीं सकता. इसलिए अब तुम दोनों की कानूनी तौर से कोर्टमैरिज करवा देंगे. तुम हमारे साथ रह कर हमारे मजहब और रीतिरिवाज को जान लो. जब तुम्हारा मन पूरी तरह से इसलाम को कुबूल करना चाहे तब तुम अपना मजहब बदलना.’’ यह सुनते ही राधिका को राहत मिली और उस ने अपनी सास को गले लगा लिया.

उस घर का माहौल राधिका को बहुत पसंद आया. राधिका को ऐसा लगा कि उस घर के कोनेकोने में प्यार ही प्यार है. कोई भी किसी से बुरा सुलूक नहीं करता और ऊंची आवाज में भी नहीं बोलता था. खासकर, अपनी सास के प्यार से वह फूली न समाई. बिलाल की मां अपनी दोनों बहुओं को अपनी बेटी की तरह प्यार और सम्मान देती थीं.

बिलाल की मां को सिलाई व कढ़ाई में ज्यादा दिलचस्पी थी. वे उस बंगले के बाहर वाले एक बड़े कमरे में अपनी डिजाइनर साडि़यों का बुटीक चला रही थीं. राधिका ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया था, इसलिए वह भी अपनी सास के साथ साडि़यां तैयार करने लगी और बुटीक में जा कर वहां भी काम संभालने लगी. एक दिन जब राधिका अपनी सास के साथ बुटीक में बैठी थी, उस वक्त एक छोटा सा पत्थर आ कर गिरा. उस पत्थर से बुटीक का एक शीशा टूट गया. सासबहू हैरान हो गईं. इतने में और भी बहुत सारे पत्थर आ कर गिरे. दोनों ने बाहर आ कर देखा तो वहां राधिका के दोनों भाई खड़े थे. उन्हें देखते ही राधिका को यह आभास हुआ कि यह हरकत इन दोनों की ही है. इस हरकत से राधिका को बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई. इस के बाद राधिका के दोनों भाई सड़क पर खड़े हो कर बहन को गाली देने लगे.

‘‘यही है वह औरत जिस ने एक मुसलमान से शादी की. बेशरम कहीं की,’’ ऐसा कह कर राधिका के भाई राधिका का अपमान करने लगे. यह सुन कर राधिका शर्म से पानीपानी हो गई. राधिका अपना सिर पकड़ कर बैठ गई. राधिका इस सोच में पड़ गई कि इस मामले को कैसे सुलझाए. राधिका को पता था कि उस के भाई लखनऊ शहर के बहुत बड़े गुंडे हैं और 2-3 बार जेल की हवा भी खा चुके हैं. उन के पिताजी ने उन्हें जेल से छुड़वाया और जब राधिका की मां ने कुछ पूछने की कोशिश की तो प्रेमप्रकाश ने बात काट कर, ‘‘तुम औरत हो. यह मामला मर्दों का है और मेरे बेटों ने मर्दों जैसा काम किया है, तुम बीच में मत बोलो,’’ लक्ष्मी को चुप करा दिया.

आज उन दोनों भाइयों ने राधिका के ससुराल वालों के सामने आ कर अपनी गुंडागर्दी दिखाई. इतने में 4-5 छोटेछोटे पत्थर और आ कर गिरे और उन में से एक पत्थर राधिका की सास के माथे पर लगा और उन्हें चोट लग गई.

घर आ कर राधिका ने अपनी सास की चोट पर मरहम लगाया. इस दुर्घटना की खबर मिलते ही बिलाल के अब्बूजान घर लौट आए. उन सब के सामने राधिका ने झिझकते हुए कहा, ‘‘अब्बूजान, मेरे भाइयों ने ही हमारे बुटीक पर पत्थर फेंके थे. आप मेरे बारे में मत सोचिए. उन्होंने जो किया, गलत किया और आप पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा दीजिए.’’ राधिका की बातें सुन कर सब ने अब्बूजान की ओर देखा क्योंकि फैसला लेने वाले वे ही थे. ‘‘ठीक है जुबैदा, तुम अभी आराम करो. कल से बुटीक के लिए एक सिक्योरिटी गार्ड रखेंगे. तुम दोनों औरतें अकेले में ऐसी हालत को नहीं संभाल पाओगी. इसलिए एक गार्ड की जरूरत है.’’ उन की बातों से यह स्पष्ट था कि वे इस मामले को पुलिस तक ले जाना नहीं चाहते हैं. मगर राधिका ने उन के पास जा कर सहम कर कहा, ‘‘अब्बूजान, मैं आप से निवेदन करती हूं कि आप मेरे भाइयों को माफ मत कीजिए. उन्होंने जो भी किया वह बिलकुल गलत है.

अगर आप इस बार उन्हें माफ करेंगे तो उन की जुर्रत और बढ़ जाएगी. इसलिए आप उन के खिलाफ पुलिस में शिकायत करा दीजिए.’’ ‘‘मैं तुम्हारे जज्बे को समझ सकता हूं बहू, मगर हमें इस मामले में सावधानी बरतनी होगी. जिन्होंने यह हरकत की, वे तुम्हारे भाई हैं. आज नहीं तो कल, हम एक परिवार हो जाएंगे. अगर हम आज जल्दबाजी में पुलिस के पास गए तो हमारे रिश्ते में दरार आ जाएगी. हमें सब्र से काम लेना चाहिए. उन दोनों को एक न एक दिन अपनी गलती का एहसास होगा. हम उस दिन का इंतजार करेंगे.’’ उन के बड़प्पन के सामने अपने पिता की हरकतों को याद कर राधिका की आंखें नम हो गईं.

इस दरमियान रमजान का महीना आया. रमजान के महीने के 10वें दिन दोपहर की नमाज के बाद अचानक राधिका बेहोश हो गई और उसे देख कर सब के होश उड़ गए. तुरंत डाक्टर को बुलावाया गया. राधिका की जांच करने के बाद डाक्टर ने मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘आप लोगों के लिए खुशखबरी है, आप के घर में एक नया मेहमान आने वाला है.’’ यह सुन कर सभी पुलकित हो उठे.

बिलाल के परिवार ने राधिका को पलकों पर बिठाया. अब्बूजान और भाईजान दोनों रोज राधिका के लिए फल खरीद कर लाते थे. जुबैदा और जीनत दोनों खास पकवान बनातीं. सब का प्यार देख कर राधिका की आंखें डबडबा गईं. अचानक एक दिन जुबैदा को थकान महसूस हुई और वे एक कुरसी पर बैठ गईं. उन के दाहिने हाथ में इतना दर्द होने लगा कि उसे उठा ही नहीं पाई और धीरेधीरे वह दर्द सीने तक पहुंच गया और जुबैदा बेहोश हो गईं. घर के लोग उन्हें ले कर अस्पताल पहुंचे. डाक्टर ने जांच कर के उन्हें तुरंत आईसीयू में दाखिल कर दिया.

डाक्टर ने कहा, ‘‘इन्हें हार्टअटैक आया है. इन की आर्टरी में ब्लौकेज है और तुरंत बाइपास सर्जरी करनी पड़ेगी. सारी फौर्मेलिटीज पूरी करने के बाद हम औपरेशन करेंगे. इस के लिए कुल मिला कर 5 लाख रुपए खर्च करना होगा आप को.’’ यह सुन कर परिवार के सभी लोग उदास हो गए. बिलाल के पिताजी हताश हो गए थे. शादी हुए इतने सालों में अपनी बीवी को ऐसी हालत में वे पहली बार देख रहे हैं और वे उसे बरदाश्त नहीं कर सके. बच्चों ने पहली बार अपने अब्बूजान की आंखों में आंसू छलकते हुए देखे.

बिलाल के अब्बूजान के पास इस वक्त इतने रुपए नहीं थे. उन्होंने अपने दोनों बेटों के लिए लखनऊ की मेन मार्केट में अलगअलग दुकान खोलने के लिए अपनी सारी बचत उस में लगा दी थी. उन की मजबूरी देख कर राधिका ने कहा, ‘‘अब्बूजान, आप ने हमारी बुटीक की कमाई को कभी भी नहीं मांगा. अब हमारे पास 10 लाख रुपए हैं और आप बेफिक्र रहिए.’’ अम्मीजान का औपरेशन बिना किसी परेशानी के साथ हो गया. सभी अस्पताल में अम्मीजान के पास थे. उस समय राधिका के मोबाइल की घंटी बजी. उस की मां का फोन था. शादी होने के बाद मां ने एक बार भी फोन नहीं किया था. अब क्यों फोन कर रही है? सोचते हुए राधिका ने ‘हैलो’ कहा तो दूसरी तरफ उस की मां की हड़बड़ाई आवाज सुनाई दी, ‘‘राधिका, तुम्हारी मदद चाहिए. तुम्हारे भाइयों को पुलिस पकड़ कर ले गई है और उन्हें जमानत पर छुड़वाने के लिए 5 लाख रुपए चाहिए.’’ यह सुनते ही राधिका के क्रोध की सीमा नहीं रही.

औपचारिकता के लिए भी मां ने यह नहीं पूछा कि तुम कैसी हो, मगर अपना अधिकार जताते हुए अपने नालायक बेटों के लिए रुपए मांग रही है. वह गुस्से में बोली, ‘‘किस हक से आप मुझ से इतने रुपए मांग रही हैं? आप लोगों ने दर्द के सिवा क्या दिया है मुझे और मुझ से मदद मांगने में आप को लज्जा नहीं आई?’’ ऐसा कहते हुए राधिका ने गुस्से में तमतमाते हुए फोन काट दिया. अब्बूजान यह सब सुन रहे थे.

5 दिनों के बाद जुबैदा घर वापस आ गईं. दोनों बहुओं ने अपनी सास की खूब देखभाल की. दूसरे दिन सुबह ही अब्बूजान कहीं बाहर जाने की तैयारी करने लगे. सब ने सोचा कि शायद वे अपनी दुकान जा रहे हैं. उन्होंने राधिका से पूछा, ‘‘बेटी, तुम्हारे पास जो 5 लाख रुपए हैं, क्या तुम मुझे दे सकती हो? राधिका ने बिना कोई सवाल पूछे चैक में दस्तखत कर के अब्बूजान को दे दिया. उस चैक को अपने पौकेट में रख कर उन्होंने कहा,’’ मैं अपने संबंधी के घर तक जा रहा हूं.’’ यह सुन कर सब हैरान हो गए क्योंकि बड़ी बहू जीनत का घर लखनऊ में नहीं, फिर किस संबंधी का जिक्र कर रहे हैं अब्बूजान. ‘‘मैं राधिका के मायके के बारे में बात कर रहा हूं. वे हमारे संबंधी ही हैं. उन के घर के बेटे जेल में सड़ रहे हैं. उन्हें रिहा कराने के लिए ये रुपए ले जा रहा हूं.’’ राधिका ने कुछ कहने की कोशिश कि तो अब्बूजान ने बीच में बात काट कर कहा, ‘‘बहू, तुम्हारा गुस्सा जायज है मगर यह वक्त नहीं है गुस्सा निकालने का. जब वे हम से मदद मांग रहे हैं, तो इनकार करना ठीक नहीं और इंसानियत भी नहीं है.’’ उन की बातें सुन कर सब सन्न हो गए.

अचानक अपने घर की चौखट पर राधिका के ससुरजी को देख कर राधिका के मांबाप दोनों आश्चर्यचकित हो गए. मगर वे मुसकराते हुए घर के अंदर गए और लक्ष्मी को 5 लाख रुपए का चैक दे कर कहा, ‘‘बहनजी, राधिका एक बच्ची है. इसलिए जब आप ने उसे फोन किया तो गुस्से में आ कर न जाने उस ने क्या कह दिया. उस की तरफ से मैं आप से माफी मांगता हूं. इन रुपयों से अपने बेटों को रिहा कराने का काम शुरू कीजिए.’’ यह सुन कर लक्ष्मी और प्रेमप्रकाश दोनों की नजरें झुक गईं. ‘‘भाईजान, आप से मैं कुछ बात करना चाहता हूं. बच्चे पतिपत्नी की देन होते हैं. उन्हें अच्छी परवरिश देना हमारा फर्ज है. बच्चों में बेटाबेटी का फर्क करना प्यार का अपमान करने के समान है. जो भी हमें मिले उसे सच्चे मन से अपनाना ही हमारे लिए उचित है और एक बात सुनिए, बच्चों को सहीगलत सिखाना भी हमारा ही कर्तव्य है. अगर बच्चे गलत रास्ते पर चल पड़ें तो इस का मतलब है हमारी परवरिश में ही खोट है. यह मत सोचना कि मैं आप के बेटों की गलतियों के लिए आप को दोषी ठहरा रहा हूं. आगे से उन दोनों को सही रास्ते पर चलने की सीख दीजिए. अपने मन से द्वेष की भावना को हटा दीजिए और अपने बच्चों के मन में भी इस जहर के बीच को मत बोइए. इस दुनिया में हमेशा प्यार की ही जीत होगी, नफरत की नहीं.’’ उन की बातें सुन कर जिंदगी में पहली बार प्रेमप्रकाश का अभिमान टूट गया और फूटफूट कर रोने लगे. आगे बढ़ कर जमाल साहब ने प्रेमप्रकाश को गले लगाया और वहां हुई प्यार की जीत.

खुद को कभी अकेला न समझे

समय पर विवाह न हो पाने, जीवनरूपी सफर में हमसफर द्वारा बीच में ही साथ छोड़ देने या पतिपत्नी में आपसी तालमेल न हो पाने पर जब तलाक हो जाता है तो ऐसी स्थिति में एक महिला अकेले जीवन व्यतीत करती है. लगभग 1 दशक पूर्व तक इस प्रकार अकेले जीवन बिताने वाली महिला को समाज अच्छी नजर से नहीं देखता था और आमतौर पर वह पिता, भाई या ससुराल वालों पर निर्भर होती थी. मगर आज स्थितियां इस के उलट हैं. आज अकेली रहने वाली महिला आत्मनिर्भर, स्वतंत्र और जीवन में आने वाली हर स्थिति का अपने दम पर सामना करने में सक्षम है.

‘‘यह सही है कि हर रिश्ते की भांति पतिपत्नी के रिश्ते का भी जीवन में अपना महत्त्व है, परंतु यदि यह रिश्ता नहीं है आप के साथ तो उस के लिए पूरी जिंदगी परेशान और तनावग्रस्त रहना कहां तक उचित है? यह अकेलापन सिर्फ मन का वहम है और कुछ नहीं. इंसान और महिला होने का गौरव जो सिर्फ एक बार ही मिला है उसे मैं अपने तरीके से जीने के लिए आजाद हूं,’’ यह कहती हैं एक कंपनी में मैनेजर 41 वर्षीय अविवाहिता नेहा गोयल. वे आगे कहती हैं, ‘‘मैं आत्मनिर्भर हूं. अपनी मरजी का खाती हूं, पहनती हूं यानी जीती हूं.

घर की स्थितियां कुछ ऐसी थीं कि मेरा विवाह नहीं हो पाया, परंतु मुझे कभी जीवनसाथी की कमी नहीं खली, बल्कि मुझे लगता है कि यदि मेरा विवाह होता तो शायद मैं इतनी आजाद और बिंदास नहीं होती. तब मेरी उन्नति में मेरी जिम्मेदारियां आड़े आ सकती थीं. मैं अभी तक 8 प्रमोशन ले चुकी हूं, जिन्हें यकीनन परिवार के चलते नहीं ले सकती थी.’’ केंद्रीय विद्यालय से प्रिसिंपल पद से रिटायर हुईं नीता श्रीवास्तव का अपने पति से उस समय तलाक हुआ जब वे 45 वर्ष की थीं और उन का बेटा 15 साल का. वे कहती हैं, ‘‘कैसा अकेलापन? मैं आत्मनिर्भर थी.

अच्छा कमा रही थी. बेटे को अच्छी परवरिश दे कर डाक्टर बनाया. अच्छा खाया, पहना और खूब घूमी. पूरी जिंदगी अपनी शर्तों पर बिताई. कभी मन में खयाल ही नहीं आया कि मैं अकेली हूं. जो नहीं है या छोड़ गया है, उस के लिए जो मेरे पास है उस की कद्र न करना कहां की बुद्धिमानी है?’’

रीमा तोमर के पति उन्हें उस समय छोड़ गए जब उन का बेटा 10 साल का और बेटी 8 साल की थी. उन की उम्र 48 वर्ष थी. पति डीएसपी थे. अचानक एक दिन उन्हें अटैक आया और वे चल बसे. अपने उन दिनों को याद करते हुए वे कहती है, ‘‘यकीनन मेरे लिए वे दिन कठिन थे. संभलने में थोड़ा वक्त तो लगा पर फिर मैं ने जीवन अपने तरीके से जीया.

आज मेरा बेटा एक स्कूल का मालिक है और बेटी अमेरिका में है. पति के साथ बिताए पल याद तो आते थे, परंतु कभी किसी पुरुष की कमी महसूस नहीं हुई. मैं अपनी जिंदगी में बहुत खुश थी और आज भी हूं.’’ मनोवैज्ञानिक काउंसलर निधि तिवारी कहतीं हैं, ‘‘अकेलापन मन के वहम के अलावा कुछ नहीं है. कितनी महिलाएं जीवनसाथी और भरेपूरे परिवार के होते हुए भी सदैव अकेली ही होती हैं. वंश को बढ़ाने और शारीरिक जरूरतों के लिए एक पति की आवश्यकता तो होती है, परंतु यदि मन, विचार नहीं मिलते तो वह अकेली ही है न? इसलिए अकेलेपन जैसी भावना मन में कभी नहीं आने देनी चाहिए.’’

अकेली औरतें ज्यादा सफल कुछ समय पूर्व एक दैनिक पेपर में एक सर्वे प्रकाशित हुआ था जो अविवाहित, तलाकशुदा और विधवा महिलाओं पर कराया गया था. उस के अनुसार:

अकेली रहने वाली 93% महिलाएं मानती हैं कि उन का अकेलापन गृहस्थ महिलाओं की तुलना में जीवन के सभी क्षेत्रों में सफल रहने में अधिक सहायक सिद्ध हुआ है. इस से उन्हें आजादी से जीवन जीने का अधिकार मिला है.

65% महिलाएं जीवन में पति की आवश्यकता को व्यर्थ मानती हैं और वे विवाह के लिए बिलकुल भी इच्छुक नहीं हैं. द्य आवश्यकता पड़ने पर विवाह करने के बजाय इन्होंने किसी अनाथ बच्चे को गोद लेना अधिक अच्छा समझा.

इन्हें कभी खालीपन नहीं अखरता. ये अपनी रुचि के अनुसार सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती है और आधुनिक मनोरंजन के साधनों का लाभ उठाती हैं. चिंतामुक्त हो कर जी भर कर सोती हैं.

इस सर्वेक्षण के अनुसार एकाकी जीवन जीने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं की संख्या के अनुपात में बहुत कम है.

बढ़ रहा सिंगल वूमन ट्रैंड

पिछले दशक से यदि तुलना की जाए तो एकाकी जीवन जीने वाली महिलाओं की संख्या में 39 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. विदेशों में अकेले जीवन जीने वाली महिलाओं की उपस्थिति समाज में बहुत पहले से ही है, साथ ही वहां वे उपेक्षा और उत्पीड़न की शिकार भी नहीं होतीं. भारतीय समाज में 1 दशक में महिलाओं की स्थिति में तेजी से सुधार हुआ है. हाल ही में आई पुस्तक ‘आल द सिंगल लेडीज अनमैरिड वूमन ऐंड द राइज औफ एन इंडिपैंडैंट नेशन’ की लेखिका रेबेका टेस्टर के अनुसार 2009 के अनुपात में इस दशक में सिंगल महिलाओं की बढ़ती संख्या समाज में उन के महत्त्व का दर्ज कराती है.

यह सही है कि हर रिश्ते की अपनी गरिमा और महत्त्व होता है. अकेलापन सिर्फ मन का वहम तो है, परंतु इस के लिए सब से आवश्यक शर्त है महिला की आत्मनिर्भरता और आत्मशक्ति का मजबूत होना, क्योंकि यदि वह आत्मनिर्भर नहीं है तो उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पराधीन होना होगा. पराधीनता तो सदैव कष्टकारी ही होती है. आत्मनिर्भरता की स्थिति में उस पर किसी का दबाव नहीं होता और अपने ऊपर उंगली उठाने वालों को भी मुंहतोड़ जवाब दे पाने में सक्षम होती है. ‘‘अकेले रहने वाली महिलाओं को अपनी आत्मशक्ति को मजबूत रखना चाहिए. जो जिंदगी आप ने चुनी है उस में खुश रहना चाहिए. कभी किसी को अपने पति के साथ देख कर मन को कमजोर करने वाले विचार नहीं आने चाहिए,’’ यह कहती हैं नीता श्रीवास्तव.

जब भी कभी ऐसा अवसर जीवन में आता है तो इसे सिर्फ अपने मन का वहम मानें और सचाई को स्वीकार कर के जीवन को आगे बढ़ाएं. जिंदगी जिंदादिली का नाम है न कि किसी के सहारे का मुहताज होने का. स्वयं को अंदर से मजबूत कर के अपनी शक्ति को सामाजिक और रचनात्मक कार्यों में लगाना चाहिए. साथ ही कुछ ऐसे संसाधनों को भी खोजना चाहिए जिन में आप व्यस्त रहें.

कुछ इंच की दूरी : एक कहानी

काम की व्यस्तता के चलते मनीष के पास इतना भी समय नहीं था कि यह अपनी पत्नी अचला के साथ हंसीखुशी के दो पल गुजार सके. फिर अचला ने ऐसा क्या किया कि स्थिति खुदबखुद ठीक हो गई

रात के 11 बज रहे थे. बाहर बारिश हो रही थी. अचला अपने बैडरूम की खुली खिड़की से बाहर का दृश्य देख रही थी, आंसू चुपचाप उस के गालों को भिगोने लगे थे. दिल में तूफान सा मचा था. वह बहुत उदास थी. कहां वह ऐसे हसीन मौसम का आनंद मनीष की बांहों में खो कर लेना चाहती थी और कहां अब अकेली उदास लेटी थी. उस ने 2 घंटे से लैपटौप पर काम करते मनीष को देखा, तो खुद को रोक नहीं पाई. कहने लगी, ‘‘मनीष, क्या हो रहा है यह… कितनी देर काम करते रहोगे?’’

‘‘तुम सो जाओ, मुझे नींद नहीं आ रही.’’

अचला का मन हुआ कि कहे नींद नहीं आ रही तो यह समय पत्नी के साथ भी तो बिता सकते हो, लेकिन वह कह नहीं पाई. यह एक दिन की तो बात थी नहीं. रोज का काम था. महीने में 10 दिन मनीष टूअर पर रहता था, बाकी समय औफिस या घर पर लैपटौप अथवा अपने फोन में व्यस्त रहता था.अचला को अपना गला सूखता सा लगा तो पानी लेने किचन की तरफ चली गई. सासससुर प्रकाश और राधा के कमरे की लाइट बंद थी. बच्चों के रूम में जा कर देखा तो तन्मय और तन्वी भी सो चुकी थे. घर में बिलकुल सन्नाटा था.वह बेचैन सी पानी पी कर अपने बैड पर आ कर लेट गई. सोचने लगी कि प्यार का खुमार कुछ सालों बाद इतना उतर जाता है? रोमांस का सपना दम क्यों तोड़ देता है? रोजरोज की घिसीपिटी दिनचर्या के बोझ तले प्यार कब और क्यों कुचल जाता है पता भी नहीं चलता. प्यार रहता तो है पर उस पर न जाने कैसे कुहरे की चादर पड़ जाती है कि पुराने दिन सपने से लगते हैं.

लोगों के सामने जब मनीष जोश से कहता कि मुझे तो घर की, मांपिताजी की, बच्चों की पढ़ाई की कोई चिंता नहीं रहती, अचला सब मैनेज कर लेती है, तो अचला को कुछ चुभता. सोचती बस, मनीष को अपनी पत्नी के प्रति अपना कोई फर्ज महसूस नहीं होता. आज वह बहुत अकेलापन महसूस कर रही थी. उस से रहा नहीं गया तो उठ बैठी. फिर कहने लगी, ‘‘मनीष, क्या हम ऐसे ही बंधेबंधाए रूटीन में ही जीते रहेंगे? तुम्हें नहीं लगता कि हम कुछ बेहतरीन पल खोते जा रहे हैं, जो हमें इस जीवन में फिर नहीं मिलेंगे?’’

मनीष ने लैपटौप से नजरें हटाए बिना ही कहा, ‘‘अचला, मैं आज जिस पोजीशन पर हूं उसी से घर में हर सुखसुविधा है… तुम्हें किसी चीज की कोई कमी नहीं है, फिर तुम क्यों उदास रहती हो?’’

‘‘पर मुझे बस तुम्हारा साथ और थोड़ा समय चाहिए.’’

‘‘तो मैं कहां भागा जा रहा हूं. अच्छा, जरा एक जरूरी मेल भेजनी है, बाद में बात करता हूं.’’

फिर मनीष कब बैड पर आया, अचला की उदास आंखें कब नींद के आगोश में चली गईं, अचला को कुछ पता नहीं चला. काफी दिनों से प्रकाश और राधा उन दोनों के बीच एक सन्नाटा सा महसूस कर रहे थे, कहां इस उम्र में भी दोनों के पास बातों का भंडार था कहां उन के आधुनिक बेटाबहू नीरस सा जीवन जी रहे थे. राधा देख रही थीं कि अचला मनीष के साथ समय बिताने की चाह में उस के आगेपीछे घूमती है, लेकिन वह अपनी व्यस्तता में हद से ज्यादा डूबा था. यहां तक कि खाना खाते हुए भी फोन पर बात करता रहता. उसे पता भी नहीं चलता था कि उस ने क्या खाया. अचला का उतरा चेहरा प्रकाश और राधा को तकलीफ पहुंचाता. बच्चे अपनी पढ़ाई, टीवी में व्यस्त रहते. उन से बात कर के भी अचला के चेहरे पर रौनक नहीं लौटती.

एक दिन प्रकाश और राधा ने मनीष को अपने पास बुलाया. प्रकाश ने कहा, ‘‘काम करना अच्छी बात है, लेकिन उस में इतना डूब जाना कि पत्नी को भी समय न दे पाओ, यह ठीक नहीं है.’’

‘‘पापा, क्या कह रहे हैं आप? समय ही कहां है मेरे पास? देखते नहीं कितना काम रहता है मेरे पास?’’

‘‘पढ़ीलिखी होने के बाद भी अचला ने घरगृहस्थी को ही प्राथमिकता दी. कहीं नौकरी करने की नहीं सोची. दिनरात सब का ध्यान रखती है, कम से कम उस का ध्यान रखना तुम्हारा फर्ज है बेटा,’’ मां राधा बोलीं.

‘‘मां, उस ने आप से कुछ कहा है? मुझे नहीं लगता कि वह मेरी जिम्मेदारियां समझती है?’’

‘‘उस ने कभी कुछ नहीं कहा, लेकिन हमें तो दिखती है उस की उदासी. मनीष, संसार में सब से लंबी दूरी होती है सिर्फ 14 इंच की, दिमाग से दिल तक, इसे तय करने में काफी उम्र निकल जाती है. कभीकभी यह दूरी इंसान का बहुत कुछ छीन लेती है और उसे पता भी नहीं चल पाता,’’ राधा ने गंभीर स्वर में कहा तो मनीष बिना कुछ कहे टाइम देखता हुआ जाने के लिए खड़ा हो गया.

प्रकाश ने कहा, ‘‘मुझे इस पर किसी बात का असर होता नहीं दिख रहा है.’’

राधा ने कहा, ‘‘आज अचला से भी बात करूंगी. अभी उसे भी बुलाती हूं.’’

उन की आवाज सुन कर अचला आई तो राधा ने स्नेह भरे स्वर में कहा, ‘‘बेटा, देख रही हूं आजकल कुछ चुप सी रहती हो. भावुक होने से काम नहीं चलता बेटा. मैं तुम्हारी उदासी का कारण समझ सकती हूं.’’

प्रकाश ने भी बातचीत में हिस्सा लेते हुए कहा, ‘‘स्थान, काल, पात्र के अनुसार इंसान को खुद को उस में ढाल लेना चाहिए. तुम भी कोशिश करो, सुखी रहोगी.’’

अचला ने मुसकरा कर हां में सिर हिला दिया. सासससुर उसे बहुत प्यार करते हैं, यह वह जानती थी. अचला अकेले बैठी सोचने लगी. मांपिताजी ठीक ही तो कह रहे हैं, मैं ही क्यों हर समय रोनी सूरत लिए मनीष के साथ समय बिताने के लिए उन के आगेपीछे घूमती रहूं? रोजरोज पासपड़ोस में निंदापुराण सुनने में मन भी नहीं लगता, लाइब्रेरी की सदस्यता ले लेती हूं. कुछ अच्छी पत्रिकाएं पढ़ा करूंगी. कंप्यूटर सीखा तो है पर उस से ज्यादा अपनों के साथ बात करना अच्छा लगता है. कहां दिल लगाऊं? पता नहीं क्यों आज एक नाम अचानक उस के जेहन में कौंध गया, विकास. कहां होगा, कैसा होगा? वह उस अध्याय को शादी से पहले समाप्त समझ साजन के घर आ गई थी. लेकिन आज उसी बंद अध्याय के पन्ने फिर से खुलने के लिए उस के सामने फड़फड़ाने लगे.

विकास उम्र का वह जादू था जिसे कोई चाह कर भी वश में नहीं कर सकता. यह भी सच था मनीष से विवाह के बाद उस ने विकास को मन से पूरी तरह निकाल दिया था. विकास से उस का विवाह जातिधर्म अलगअलग होने के कारण दोनों के मातापिता को मंजूर नहीं था. फिर मातापिता के सामने जिद करने की दोनों की हिम्मत भी नहीं हुई थी. दोनों ने चुपचाप अपनेअपने मातापिता की मरजी के आगे सिर झुका दिया था. आज जीवन के इस मोड़ पर नीरस जीवन के अकेलेपन से घबरा कर अचला विकास को ढूंढ़ने लगी. अचला ने कंप्यूटर औन किया, फेसबुक पर अकाउंट था ही उस का. सोचा उसे सर्च करे, क्या पता वह भी फेसबुक पर हो. नाम टाइप करते ही असंख्य विकास दिखने लगे, लेकिन अचानक एक फोटो पर नजर टिक गई. यह वही तो था. फिर उस ने उस का प्रोफाइल चैक किया, शहर, कालेज, जन्मतिथि सब वही. उस ने फौरन मैसेज बौक्स में मैसेज छोड़ा, ‘‘अचला याद है?’’

3 दिन बाद मैसेज आया, ‘‘हां, कभी भूला ही नहीं.’’

मैसेज आते ही अचला ने अपना मोबाइल नंबर भेज दिया. कुछ देर बाद ही वह औनलाइन दिखा और कुछ पलों में ही दोनों भूल गए कि उन का जीवन 15 साल आगे बढ़ चुका है. अचला भी मां थी अब तो विकास भी पिता था. अचला मुंबई में थी, तो विकास इस समय लखनऊ में था. अब दोनों अकसर चैट करते. कितने नएपुराने किस्से शुरू हो गए. बातें थीं कि खत्म ही नहीं होती थीं. पुरानी यादों का अंतहीन सिलसिला. प्रकाश और राधा चूंकि घर पर ही रहते थे, इसलिए बहू में आया यह परिवर्तन उन्होंने साफसाफ नोट किया. अचला के बुझे चेहरे पर रौनक रहने लगी थी. हंसतीमुसकराती घर के काम जल्दीजल्दी निबटा कर वह अपने बैडरूम में रखे कंप्यूटर पर बैठ जाती. कई बार वह विकास को अपने दिमाग से झटकने की कोशिश तो करती पर भूलाबिसरा अतीत जब पुनर्जीवित हो कर साकार सामने आ खड़ा हुआ तो उस से पीछा छुड़़ा पाना उतना आसान थोड़े ही होता है.

अब मनीष रात को लैपटौप पर होता, तो अचला फेसबुक पर. 1-2 बार मनीष ने पूछा, ‘‘तुम क्या ले कर बैठने लगी?’’

‘‘चैट कर रही हूं.’’

‘‘अच्छा? किस के साथ?’’

‘‘कालेज का दोस्त औनलाइन है.’’

मनीष चौंका पर चुप रहा. अचला और विकास अकसर एकदूसरे के संपर्क में रहते, पुरानी यादें ताजा हो चुकी थीं. दोनों अपनेअपने परिवार के बारे में भी बात करते. फोन पर भी मैसेज चलते रहते. एक दिन मनीष ने सुबह नाश्ते के समय अचला के फोन पर मैसेज आने की आवाज सुनी तो पूछा, ‘‘सुबहसुबह किस का मैसेज आया है?’’

अचला ने कहा, ‘‘फ्रैंड का?’’

‘‘कौन सी फ्रैंड?’’

‘‘आप को मेरी फ्रैंड्स में रुचि लेने का टाइम कब से मिलने लगा?’’

अचला मैसेज चैक कर रही थी, पढ़ कर अचला के चेहरे पर मुसकान फैल गई. विकास ने लिखा था, ‘‘याद है एक दिन मेरी मेज पर बैठेबैठे मेरी कौपी में तुम ने छोटे से एक पौधे का एक स्कैच बनाया था. आ कर देखो उस पौधे पर फूल आया है.’’ अचला की भेदभरी मीठी मुसकान सब ने नोट की. मनीष के चेहरे का रंग उड़ गया. वह चुप रहा. प्रकाश और राधा भी कुछ नहीं बोले.

तन्मय ने कहा, ‘‘मम्मी, आजकल आप बहुत बिजी दिखती हैं फोन पर. आप ने भी हमारी तरह खूब फ्रैंड्स बना लीं न?’’

तन्वी ने भी कहा, ‘‘अच्छा है मम्मी, कभी कंप्यूटर पर, कभी फोन पर, आप का अच्छा टाइमपास होता है न अब?’’

‘‘क्या करती बेटा, कहीं तो बिजी रहना ही चाहिए वरना बेकार तुम लोगों को डिस्टर्ब करती रहती थी.’’

मनीष ने उस के व्यंग्य को साफसाफ महसूस किया. प्रकाश और राधा ने अकेले में स्थिति की गंभीरता पर बात की. प्रकाश ने कहा, ‘‘राधा, मुझे लग रहा है हमारी बहू किसी से…’’

बात बीच में ही काट दी राधा ने, ‘‘मुझे अपनी बहू पर पूरा भरोसा है, मनीष को हम समझासमझा कर थक गए कि अचला और परिवार के लिए समय निकाले, पर उस के कान पर तो जूं तक नहीं रेंगती. पत्नी के प्रति उस की यह लापरवाही मुझे सहन नहीं होती. अब अचला अपने किसी दोस्त से बात करती है तो करने दो, मनीष का चेहरा देखा मैं ने आज, बहुत जल्दी उसे अपनी गलती समझ आने वाली है.’’

‘‘ठीक कहती हो राधा, मनीष बस काम को ही प्राथमिकता देने में लगा रहता है. मानता हूं वह भी जरूरी है पर उस के साथसाथ उसे अपने पति होने के दायित्व भी याद रखना चाहिए.’’ अगले कुछ दिन मनीष ने साफसाफ नोट किया कि अब अचला ने उसे कुछ कहना छोड़ दिया है. चुपचाप उस के काम करती. वह कुछ पूछता तो जवाब दे देती वरना अपनी ही धुन में मगन रहती. वह उस के औफिस जाने के बाद कंप्यूटर पर ही बैठी रहती है, यह वह घर के सदस्यों से जान ही चुका था. उस के सामने वह अपने फोन में व्यस्त रहती. अचला का फोन चैक करने की उस की बहुत इच्छा होती, लेकिन उस की हिम्मत न होती, क्योंकि घर में कोई किसी का फोन नहीं छूता था. यह घर वालों का एक नियम था.

एक दिन रात के 9 बज रहे थे. अचला विकास से चैटिंग करने की सोच ही रही थी कि अपना जरूरी काम जल्दी से निबटा कर और अचला का ध्यान कंप्यूटर और फोन से हटाने के लिए विकास ने अपना लैपटौप जल्दी से बंद कर दिया.

अचला ने चौंक कर पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘मूड नहीं हो रहा काम करने का.’’

‘‘फिर क्या करोगे?’’

मनीष ने उसे बांहों में कस लिया. शरारत से हंसते हुए कहा, ‘‘बहुत कुछ है करने के लिए,’’  और फिर रूठी सी अचला पर उस ने प्रेमवर्षा कर दी.

अचला हैरान सी उस बारिश में भीगती रही. उस में भीग कर उस का तनमन खिल उठा. अगले कई दिनों तक मनीष ने अचला को भरपूर प्यार दिया. उसे बाहर डिनर पर ले गया, औफिस से कई बार उस का हालचाल पूछ कर उसे छेड़ता, जिसे याद कर अचला अकेले में भी हंस देती. पतिपत्नी की छेड़छाड़ क्या होती है, यह बात तो अचला भूल ही गई थी. उस ने जैसे मनीष का कोई नया रूप देखा था. अब वह हैरान थी, उसे एक बार भी विकास का खयाल नहीं आया था. फोन के मैसेज पढ़ने में भी उस की कोई रुचि नहीं होती थी. मनीष को अपनी गलती समझ आ गई थी और उस ने उसे सुधार भी लिया था. उस ने अचला से प्यार भरे शब्दों में कहा भी था, ‘‘मैं तुम्हारा कुसूरवार हूं, मैं ने तुम्हारे साथ ज्यादती की है, तुम्हारा दिल दुखाने का अपराधी हूं मैं.’’ बदले में अचला उस के सीने से लग गई थी. उस की सारी शिकायतें दूर हो चुकी थीं. उसे भी लग रहा था विकास से संपर्क रख कर वह भी एक अपराधबोध में जी रही थी.

14 इंच की दूरी को मनीष ने अपने प्यार और समझदारी से खत्म कर दिया था. अब अचला को कहीं भटकने की जरूरत नहीं थी. एक दिन अचला ने अचानक अपने फोन से विकास का नंबर डिलीट कर दिया और फेसबुक से भी उसे अनफ्रैंड कर दिया.